ईश्वर कैसा है यह उसी के दिए ज्ञान से जानने की श्रृंखला में अब तक वेद मंत्रों से परमात्मा के तीन गुण यथा
(1) ईश्वर सत्यस्वरूप है
(2) चेतनस्वरुप है
(3) ईश्वर सर्वशक्तिमान है
आज का मंत्र है ईश्वर निराकार है
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयमभूर्याथातथ्यतोSर्थान्व्धा च्छाश्वतीभ्यः समाभ्य।
अर्थ
(स)वे प्रभु (परि अगात्)चारों ओर है अर्थात सर्वव्यापक है।(शुक्रम्)सब जगत का कृने वाला अत्यंत तेजस्वी है।(अकायं,अव्रणं,अस्नाविरं)कारण,सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से रहित अर्थात कभी भी नस नाड़ी के बंधन में न आने वाला(शुद्धं)अविद्या दोषों से रहित अर्थात् जन्म मरण हर्ष शोक क्षुदा और तृषादि उपाधियों से सदैव पृथक (कविः)त्रिकालज्ञ,सर्ववित और महाविद्वान (मनीषी)सब जीवों के मन का प्रेरक अर्थात अंतर्यामी(परिभूः)सर्वव्यापक (स्वयंभूः)जिसका आदि का माता पिता उत्पादक कोई नहीं, किन्तु वही सबका आदिकारण है।वह परमेश्वर(शाश्वतीभ्य समाभ्यः)अनादिकाल से अपनी जीव रूप प्रजाओं को (यथातथ्यतः)ठीक ठीक रीति से (अर्थान् व्यदधात्)सम्पादन व प्रतिपादन करते हैं।यह तो जीव की ही कमी हैकि वह उन पदार्थों का ठीक प्रयोग नहीं करता व प्रभु की प्रेरणा को नहीं सुनता परिणामस्वरूप कष्ट का भागी बनता है।
शिक्षा
मंत्रान्तर्गत सभी गुण निराकार परमेश्वर में ही घट सकते हैं।उसी निराकार, दयामय परमपिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक,वेदविद्या रूपी सूर्य प्रकाशित किया है।सबका आदि कारण वहीं निराकार परमात्मा है इसलिए संसारस्थ समस्त जीवों को एकमात्र उसी निराकार परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयमभूर्याथातथ्यतोSर्थान्व्धा च्छाश्वतीभ्यः समाभ्य।
अर्थ
(स)वे प्रभु (परि अगात्)चारों ओर है अर्थात सर्वव्यापक है।(शुक्रम्)सब जगत का कृने वाला अत्यंत तेजस्वी है।(अकायं,अव्रणं,अस्नाविरं)कारण,सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर से रहित अर्थात कभी भी नस नाड़ी के बंधन में न आने वाला(शुद्धं)अविद्या दोषों से रहित अर्थात् जन्म मरण हर्ष शोक क्षुदा और तृषादि उपाधियों से सदैव पृथक (कविः)त्रिकालज्ञ,सर्ववित और महाविद्वान (मनीषी)सब जीवों के मन का प्रेरक अर्थात अंतर्यामी(परिभूः)सर्वव्यापक (स्वयंभूः)जिसका आदि का माता पिता उत्पादक कोई नहीं, किन्तु वही सबका आदिकारण है।वह परमेश्वर(शाश्वतीभ्य समाभ्यः)अनादिकाल से अपनी जीव रूप प्रजाओं को (यथातथ्यतः)ठीक ठीक रीति से (अर्थान् व्यदधात्)सम्पादन व प्रतिपादन करते हैं।यह तो जीव की ही कमी हैकि वह उन पदार्थों का ठीक प्रयोग नहीं करता व प्रभु की प्रेरणा को नहीं सुनता परिणामस्वरूप कष्ट का भागी बनता है।
शिक्षा
मंत्रान्तर्गत सभी गुण निराकार परमेश्वर में ही घट सकते हैं।उसी निराकार, दयामय परमपिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक,वेदविद्या रूपी सूर्य प्रकाशित किया है।सबका आदि कारण वहीं निराकार परमात्मा है इसलिए संसारस्थ समस्त जीवों को एकमात्र उसी निराकार परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए।
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सनातन धर्म
