पूरी दुनिया में सिर्फ भारत के हिन्दू ही ऐसे हैं जिनके लिए धर्म सबसे अंतिम मुद्दा है।


पूरी दुनिया में सिर्फ भारत के हिन्दू ही ऐसे हैं जिनके लिए धर्म सबसे अंतिम मुद्दा है।
कबर को महान कहते समय हम भूल जाते हैं कि स्वयं साढ़े पांच सौ शादियां करने वाले अकबर ने भी अपने पूर्वजों की परम्परा निभाते हुए अपनी बेटियों और पोतियों की शादी नहीं होने दी थी। 

सेकुलरिज्म के नाम पर अकबर को महान बताने वाले हम, उसी अकबर के परपोते दारा शिकोह का नाम तक नहीं जानते जिसने वेदों और उपनिषदों का ज्ञान प्राप्त किया, उनका उर्दू फ़ारसी में अनुवाद कराया, और अपने समय में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाई।

भारत में ईसाईयों द्वारा चलाये जा रहे स्कूलों के नाम देखिये, निन्यानवे फीसदी स्कूलों के नाम उन जोसफ, पॉल, जोन्स, टेरेसा के नाम पर रखे गए हैं, जिन्होंने जीवन भर गरीबों को फुसला फुसला कर ईसाई बनाने का धंधा चलाया था। 

पर 

पको पूरे देश में एक भी स्कूल उस स्वामी श्रद्धानंद के नाम पर नहीं मिलेगा जिन्होंने धर्मपरिवर्तन के विरुद्ध अभियान छेड़ कर हिंदुओं की घर वापसी करानी शुरू की थी। हममें से अधिकांश तो उनका नाम भी नहीं जानते होंगे।

म धर्मनिरपेक्षता का राग अलापते रह गए और हमसे बारी बारी मुल्तान, बलूचिस्तान, सिंध, पंजाब, बंग्लादेश, कश्मीर, आसाम, केरल, नागालैंड, और अब बंगाल भी छीन लिया गया। हम न कुछ समझ पाये, न कुछ कर पाये, बस देखते रह गए।

र्मा के आतंकवादी रोहिंग्यावों पर हमले होते हैं तो भारत के मुसलमानों को इतना दर्द होता है कि वे भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में आग बरसा देते हैं। 

पर 

दुनिया के किसी कोने में किसी ईसाई पर हमला होता है तो अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और तमाम ईसाई देश गरज उठते हैं।

 सबसे कम संख्या वाले यहूदियों में भी इतनी आग है कि कोई उनकी तरफ आँख उठाता है तो वे आँखे निकाल लेते हैं। 

 पर

हमारे अपने देश में, अपने लोगों को जलाया जाता है, भगाया जाता है, उजाड़ दिया जाता है पर हम साम्प्रदायिक कहलाने के डर से चूँ तक नहीं करते???
जो सभ्यता अपने नायकों को भूल जाय उसके पतन में देर नहीं लगती। 

भारत की षड्यंत्रकारी शिक्षा व्यवस्था के जाल से यदि हम जल्दी नहीं निकले, और झूठी धर्मनिरपेक्षता का चोला हमने उतार कर नहीं फेंका तो शायद पचास साल ही काफी होंगे हमारे लिए।

अत:

 उठिए... इस जाल से निकलने का प्रयास कीजिये, स्वयं को बचाने का प्रयास कीजिये। हम उस आखिरी पीढ़ी से हैं जो प्रतिरोध कर सकती है, हमारे बाद की पीढ़ी इस लायक भी नहीं बचेगी कि प्रतिकार कर सके।

आगे आपकी मर्जी

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