प्रेम के बिना जीवन एक कदम भी आगे नहीं चल सकता। जीवन प्रेम से ही प्रकट हुआ है, प्रेम से ही चलता है और प्रेम में ही विलीन हो जाता है। हरेक इच्छा के पीछे प्रेम है। फिर भी हमने देखा है कि प्रेम के साथ समस्या नाम की पूंछ भी आती है। अगर तुम वस्तुओं से ज्यादा प्रेम करते हो तो वह लालच बन जाता है, अगर तुम लोगों से ज्यादा प्रेम करते हो तो वह मोह बन जाता है, अगर तुम स्वयं से बहुत प्यार करते हो तो उससे अभिमान और अहं प्रकट होता है और तुम किसी से बहुत ज्यादा प्रेम करो तो ईष्र्या पीछे-पीछे चली आती है।
चाहे वह ईष्र्या हो, लालच हो, आसक्ति हो या क्रोध हो, सब में प्रेम शामिल है। इस ग्रह की सभी समस्याओं का कारण प्रेम ही है। प्रेम के बिना जीवन हो ही नहीं सकता। मकड़ी खुद अपना जाल बुनती है और उसी में फंस जाती है, फिर भी जाल के बगैर मकड़ी का होना नामुमकिन है। मानव जीवन भी ठीक ऐसी ही स्थिति में है। प्रेम के बिना उसका अस्तित्व नहीं हो सकता। प्रेम तुम्हारी आजादी और मानव जीवन के स्वच्छंद रहने की मूलभूत प्रकृति को छीन लेता है। इसलिए, तुम्हें ऐसे प्रेम की तलाश है, जो तुमसे तुम्हारी आजादी न छीने। वह प्रेम जो तुम्हें सब दोषों के परे देखे और जीवन के निर्मल सार का समर्थन करे। ऐसे प्रेम को भक्ति या दिव्य प्रेम कहते हैं।
वह तुम्हें कैसे मिले? ऐसे प्रेम को लेकर कौन जिया है? इन सब सवालों के जवाब पाने की खोज से ही आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ होती है। आध्यात्मिक यात्रा इस दुनिया से परे कोई अलग ही वस्तु प्राप्त करने की कल्पना नहीं है। यह जीवन के परम लक्ष्य को पाने की चेष्टा है, जिसे भक्ति या दिव्य प्रेम कहते हैं। प्रेम क्या है- यदि तुम्हें ये बिल्कुल पता ही नहीं है तो तुम दिव्य प्रेम को नहीं समझ पाओगे।
प्रेम की कई अभिव्यक्तियां हैं, जैसे अपनों से छोटों के प्रति स्नेह होता है, हमउम्र लोगों से दोस्ती और अपने से बड़ों के प्रति सम्मान और आदर। इसी तरह वस्तुओं, पशुओं, पेड़ों, आहार और संगीत से प्रेम होता है। तुम्हारी पसंद, नापसंद भी प्रेम पर आधारित है।
वह आदमी जो सुन नहीं सकता, उसे हम किसी भी तरह ये समझा नहीं सकते कि ध्वनि क्या है। हम उसी को समझा सकते हैं, जिसे पहले से कुछ मालूम हो। कोई देख नहीं सकता, कोई सुन नहीं सकता, पर प्रेम सब महसूस कर सकते हैं। यहां तक कि पत्थर और पशु भी प्रेम महसूस कर सकते हैं। कैसे बिल्लियां तुम्हारे पास आकर म्याऊं बोलते हुए घुरघुराने लगती हैं। कुत्ते भी प्रेम अभिव्यक्त करते हैं। वे तुम्हारे आगे पीछे भागते हुए अपनी पूंछ हिला-हिला कर अपना प्यार व्यक्त करते हैं। वे सब जगह कूदते फिरते हैं। जब तुम दो दिन बाहर जा कर घर वापस आते हो, वे पागल हो जाते हैं। बस तुम्हें देख कर उनकी समझ में नहीं आता वे क्या करें। वे तुम्हारे चारों ओर भागते हैं। यानी बिना कोई अपवाद के सभी में प्रेम महसूस करने की क्षमता है।
तुम जीवन में प्रेम से बच नहीं सकते। प्रेम अटल और अमर है। प्रेम हो जाना और प्रेम टूट जाना बहुत आसान है। एक दिन तुम्हें प्यार हो जाता है और दो महीने बाद ऐसा लगता है कि वो प्यार टूट गया है, लेकिन दिव्य प्रेम कभी नहीं बदलता, वह अमर है, उसके साथ कोई शर्त नहीं जुड़ी हुई है। ये उस परम प्रेम के लक्षण हैं, जिसमें तुम्हारे अंदर एक गहरी उत्कंठा, एक तीव्र अभीप्सा जन्म लेती है।
मुल्ला नसरुद्दीन की एक कहानी है। वह एक लड़की से प्रेम करता था, पर शादी उसने किसी और से की। किसी ने पूछा, ‘मुझे लगा तुम किसी और से प्रेम करते थे।’ मुल्ला ने कहा, ‘हां, पर मुझे उससे शादी नहीं करनी है, नहीं तो मेरा प्रेम गायब हो जाएगा’, हम प्रेम करते हैं और प्रेम तोड़ते हैं, क्योंकि हमें परम प्रेम के बारे में, भक्ति के बारे में मालूम नहीं है। केवल भक्ति द्वारा ही पूर्णता मिलती है।
पूर्णता के तीन स्तर हैं। कर्मों में पूर्णता, तुम्हारी वाणी में पूर्णता और तुम्हारे मन में तुम्हारे अस्तित्व की पूर्णता। कई लोग कर्म में उत्तम होते हैं, पर जरूरी नहीं कि उनकी भावना, उनकी वाणी अच्छी हो। कुछ लोगों की भावना अच्छी होती है, पर कर्म सही नहीं होते। गर्म देशों के लोगों में तुम पाओगे कि वे बहुत अच्छा महसूस करते हैं, बहुत सुंदर बोलते हैं, लेकिन जब काम करने की बात आती है तो वह होता नहीं है। ठंडी जलवायु के देशों में काम हो जाते हैं, पर वे अंदर से बड़े सख्त, हठी और कभी-कभी क्रोधित व परेशान होते हैं। लेकिन सिद्ध वही है, जो मन, वचन और कर्म से पूर्ण हो।
तुम कभी भी, किसी भी कर्म को सौ प्रतिशत सही नहीं कर सकते हो, पर तुम अपने स्वभाव में सौ प्रतिशत सही रह सकते हो, इसे सिद्ध कहते हैं और सिर्फ प्रेम ही ये पूर्णता ला सकता है।

