बिना उत्तेज़ित हुये पढ़िये और विचार कीजिये। तर्क़ों का स्वागत है, कुतर्क़ों का नहीं।

✊सवाल कई सारे  हैं
1. क्या आज़ादी मिलने के बाद भारत का "धर्म-आधारित" विभाजन हुआ?
     जवाब है, हाँ।_
2. जब महज़ धर्म के नाम पर_* *_मुसलमानों ने भारत को तोड़ दिया, फिर भारत पर उनका कैसा हक़?_*
जवाब है, कोई हक़ नहीं।_
*_3. जब बँटवारे में मुसलमानों को अलग मुस्लिम राष्ट्र मिला तो क्या हिन्दुओं को अलग हिन्दु राष्ट्र लेने का हक़ नहीं था?_*
_जवाब है, बिल्कुल था।_
*_4. चलिये छोड़िये, हिन्दुओं को अलग हिन्दु_*
*_राष्ट्र नहीं मिला, ये ना-इंसाफ़ी भी स्वीकार ! कुछ मुसलमानों ने पाक़िस्तान जाने_*
*_की बजाय हिन्दुस्तान में रहना पसन्द किया, ये भी स्वीकार। भारत एक "धर्म-निरपेक्ष" राष्ट्र घोषित हुआ, स्वीकार। तो क्या इस "धर्म-निरपेक्ष" राष्ट्र में सभी धर्मों को समान_*
*_अधिकार नहीं मिलना चाहिये था? महज़_*
*_"अल्पसंख्यक" के नाम पर किसी धर्म-विशेष को विशेषाधिकार देने का क्या औचित्य था?_*
_जवाब है - हाँ, सभी धर्मों को समान अधिकार मिलने चाहिये थे। किसी धर्म-विशेष को विशेषाधिकार देने का कोई औचित्य नहीं था।_
*_5. अगर आरक्षण देने का कोई प्रावधान था, तो क्या सभी धर्मों में आरक्षण की समान पद्धति लागू नहीं होनी चाहिये थी?_*
_जवाब है, हाँ। अगर नीतिगत तरीक़े से सोचा_
_जाये तो सभी धर्मों के लिये आरक्षण की_
_समान पद्धति लागू होनी चाहिये थी।_
*_6. चलो, इस मुद्दे को भी नज़र-अंदाज़ करते हैं।_*
*_चलो, अल्पसंख्यक के नाम पर दिये जा रहे_*
*_विशेषाधिकार भी स्वीकार! अब सवाल ये है_*
*_कि क्या मुस्लिम सांवैधानिक ढ़ाँचे के अनुरूप आज भी "अल्पसंख्यक" हैं?_*
_जवाब है, नहीं। आज वो कुल जनसंख्या का लगभग 20% हो चुके_ _हैं। तो अब वो "अल्पसंख्यक" नहीं हैं।_
_फ़िर विशेषाधिकारों का कोई औचित्य नहीं_
_है।_
*_7. अगर मुसलमान "अल्पसंख्यक" हैं तो फ़िर बुद्ध, जैन, सिंधी, पारसी, सिख आदि क्या हैं? क्या उन्हें_*  *_""अल्पसंख्यक" के नाम पर कोई विशेषाधिकार प्राप्त हैं?_*
_जवाब है, नहीं। वास्तविक अल्पसंख्यकों की_
_पूर्णतया अनदेखी हो रही है, क्यों कि वो_
_"वोट-बैंक" नहीं हैं। सरकारी उदासीनता का_
_आलम ये है कि सिंधी, पारसी आज विलुप्त होने के कगार पर हैं।_
*_8. जिसे आप धर्म-निरपेक्षता कहते हैं, क्या वो सिर्फ़ हिन्दुओं के लिये है, मुस्लिमों के लिये नहीं?_*
_जवाब है, हाँ। ये "धर्म निरपेक्षता" सिर्फ़_
_हिन्दुओं पर थोपी जाती है। कश्मीर जैसे_
_मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम, हिन्दुओं को_
_खदेड़-खदेड़ कर भगाते हैं, उनके लिये कोई "धर्म-निरपेक्षता" नहीं। जबकि हिन्दु-बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम मज़े से रहते हैं, क्योंकि हिन्दु धर्म-निरपेक्ष हैं भाई!_
*_सवाल और भी कई हैं, ये तो महज़ शुरूआती झांकी है। आशा है कि_*  *_हिन्दुओं के बीच मौज़ूद "जयचन्दों" की शायद आँखें खुलें।_*  *_मुस्लिमों और हिन्दुओं में सबसे बड़ा फ़र्क़ यही है कि मुस्लिमों में गद्दार जयचन्दों की संख्या ना के बराबर है,जबकि हिन्दुओं में कदम-कदम पर जयचन्द मौजूद हैं,_*
*_जो उसी डाल को साम्प्रदायिक बोलकर काटने में लगे हैं, जिस पर वो खुद बैठे हैं। इस मामले में मुसलमान बधाई के पात्र हैं। मुसलमान हिन्दुओ के जन्मजात दुश्मन ही सही पर हिन्दुओं को उनसे कुछ सीखना चाहिये।_*
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_मौन गुलामी के दलदल में , आज धंसी हैं भारत माँ ,"_
_"यूं लगता है फिर मुगलों के , बीच फंसी हैं भारत माँ........"_
_"केसरिया झंडे मज़ार की , चादर बनकर बैठे हैं ,"_
_"रामचंद्र के बेटे खुद ही , बाबर बनकर बैठे हैं........"_
_"हिन्दू कुल में जन्मे लेकिन , ख़ान सरीखे लगते हैं ,"_
_"ये भारत में तुर्क और , अफगान सरीखे लगते हैं........"_
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